Friday, 6 March 2026

शीतला अष्टमी कब क्यों मनाया जाता हैं

शीतला अष्टमी जिसको बसौड़ा (Basoda) भी कहा जाता है, मुख्य रूप से देवी शीतला अर्थात माता शीतला, को समर्पित एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है। शीतला अष्टमी त्योहार मनाने के पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं।

शीतला अष्टमी पर्व मुख्यतः उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार और गुजरात में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है । शीतला अष्टमी त्योहार बसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु अर्थात गरमी की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

शीतला अष्टमी त्योहार की धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताएँ

शीतला अष्टमी मनाने के पीछे मुख्य धार्मिक कारण मां देवी शीतला की पूजा है। क्योंकि माता शीतला जो स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की देवी मानी जाती हैं।

रोगों से रक्षा: 
देवी शीतला को चेचक, खसरा, चिकन पॉक्स और फोड़े-फुंसी जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है । मान्यता है कि इनकी विधिवत पूजा करने से भक्तों और उनके बच्चों को इन बीमारियों से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि विशेषकर माताएं अपनी संतान की सलामती और लंबी उम्र के लिए शीतला माता का व्रत रखती हैं।

माता शीतला देवी का स्वरूप: 
देवी शीतला को शीतलता और ठंडक प्रदान करने वाली देवी माना गया है। उनका नाम "शीतला" स्वयं ठंडक का प्रतीक है। उनकी सवारी गर्दभ (गधा) है और वे अपने हाथों में कलश, सूप (सुप्पा) और मार्जनी (झाड़ू) धारण करती हैं, जो सफाई और रोगाणुओं को दूर भगाने के प्रतीक हैं।

बासी भोजन से जुड़ी पौराणिक कथा: 
एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार एक गांव में लोगों ने देवी शीतला को गर्म और ताजे पकवानों का भोग लगा दिया, जिससे उनका मुंह जल गया और वे क्रोधित हो गईं। इससे उस रात पूरे गांव में आग लग गई। हालांकि, एक बुढ़िया की झोपड़ी बच गई क्योंकि उसने देवी को ठंडा और बासी भोजन (बसौड़ा) अर्पित किया था। तभी से देवी को प्रसन्न करने के लिए बासी भोजन चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई ।

बासी भोजन (बसौड़ा) का महत्व एवं कारण

इस पर्व को "बसौड़ा" नाम इसलिए मिला क्योंकि इसमें बासी (बसौड़ा) भोजन ग्रहण करने की परंपरा है।

पूर्व-निर्मित भोजन: 
शीतला अष्टमी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इसलिए घरों में सभी व्यंजन, जैसे मीठे चावल (दूध-भात), पूड़ी, हलवा, पकौड़ी आदि, एक दिन पहले (सप्तमी के दिन) बनाकर रख लिए जाते हैं ।

शीतलता का प्रतीक: 
चूंकि देवी शीतला को ठंडक पसंद है, इसलिए उन्हें गर्म नहीं, बल्कि ठंडा किया हुआ या बासी भोजन ही अर्पित किया जाता है। यही भोजन अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य कारण

इस परंपरा का एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक पक्ष भी है, जो ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है।

ऋतु परिवर्तन और पाचन: 
शीतला अष्टमी के आसपास मौसम सर्दी से गर्मी की ओर बदलता है। ऐसे में पाचन तंत्र कमजोर हो सकता है और संक्रामक रोग फैलने का खतरा बढ़ जाता है । इस दिन चूल्हा न जलाने और बासी भोजन खाने से परिवार को एक दिन का आराम मिलता है और पाचन तंत्र को नए मौसम के अनुकूल ढलने में मदद मिलती है।

शरीर को ठंडक: 
बासी भोजन, विशेष रूप से बासी चावल, प्राकृतिक रूप से शरीर को ठंडक पहुंचाने का काम करता है। यह गर्मी के मौसम की शुरुआत में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने में सहायक होता है ।

स्वास्थ्य लाभ: 
शोध बताते हैं कि रातभर रखा हुआ चावल (fermented rice) पाचन में सहायक अच्छे बैक्टीरिया से भरपूर होता है, कब्ज से राहत दिलाता है और इसमें कैलोरी की मात्रा भी कम हो जाती है ।

पूजा विधि और परंपराएँ

तिथि और मुहूर्त: 
यह पर्व प्रतिवर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो प्रायः होली के 8 दिन बाद पड़ता है । (उदाहरण के लिए, वर्ष 2025 में यह 22 मार्च को मनाया गया )।

पूजा का समय: 
इस दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं और माता शीतला की पूजा करती हैं। कई स्थानों पर सामूहिक रूप से चौराहों या मंदिरों में पूजा का आयोजन किया जाता है ।

प्रसाद और भोग: 
देवी को लस्सी, दूध, मीठे चावल और एक दिन पहले बने अन्य व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।

क्या न करें
इस दिन काले कपड़े पहनना और मदिरा का सेवन वर्जित माना गया है ।

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